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US-Israel Military Campaign Against Iran: Nuclear Deterrence Double Standards and the Risks to Global Order

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Trump’s Kurdish Strategy Against Iran: History, Geopolitics and the Future of the Kurdish Question in the Middle East

ट्रंप की ईरानी कुर्द नीति: इतिहास, भू-राजनीति और मध्य पूर्व की नई शक्ति-समीकरण

प्रस्तावना: कुर्द प्रश्न की वापसी

मध्य पूर्व की राजनीति में कुछ प्रश्न ऐसे हैं जो समय-समय पर दब जाते हैं, लेकिन कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होते। कुर्द प्रश्न (Kurdish Question) ऐसा ही एक ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक मुद्दा है। लगभग 3 से 4 करोड़ कुर्द, जो तुर्की, ईरान, इराक और सीरिया में फैले हुए हैं, दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा जातीय समुदाय माने जाते हैं जिनका अपना स्वतंत्र राष्ट्र नहीं है।

हाल के महीनों में अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की कथित पहल—जिसमें ईरान के कुर्द-बहुल क्षेत्रों में सक्रिय विपक्षी समूहों को समर्थन देने की संभावना जताई गई है—ने इस प्रश्न को फिर से वैश्विक रणनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। यदि यह नीति वास्तविक रूप लेती है, तो यह केवल अमेरिका-ईरान प्रतिस्पर्धा का नया चरण नहीं होगा, बल्कि कुर्द संघर्ष के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ भी बन सकता है।

यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब मध्य पूर्व पहले से ही कई स्तरों पर अस्थिरता का सामना कर रहा है—ईरान और पश्चिम के बीच बढ़ता तनाव, इज़राइल की सुरक्षा चिंताएँ, तुर्की की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएँ, और ऊर्जा बाजारों की अनिश्चितता। ऐसे में कुर्द प्रश्न का पुनरुत्थान इस पूरे क्षेत्र के शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

कुर्द पहचान और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

कुर्द मुख्यतः एक इंडो-ईरानी जातीय समूह हैं, जिनकी भाषा कुर्दी इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का हिस्सा है। उनका पारंपरिक भूभाग, जिसे सामान्यतः “कुर्दिस्तान” कहा जाता है, चार देशों में फैला हुआ है—तुर्की, ईरान, इराक और सीरिया।

कुर्दों की सांस्कृतिक पहचान मजबूत रही है—अपनी भाषा, लोक परंपराओं, संगीत और सामाजिक संरचना के साथ उन्होंने सदियों तक अपनी विशिष्टता बनाए रखी। लेकिन आधुनिक राष्ट्र-राज्य व्यवस्था के उदय के साथ उनकी स्थिति जटिल हो गई।

कुर्द राष्ट्रवाद का आधुनिक स्वरूप प्रथम विश्व युद्ध के बाद उभरा। जब ओटोमन साम्राज्य का पतन हुआ, तो मध्य पूर्व की सीमाएँ यूरोपीय शक्तियों द्वारा पुनर्गठित की गईं।

इस संदर्भ में Sykes-Picot Agreement (1916) ने क्षेत्र को ब्रिटेन और फ्रांस के प्रभाव क्षेत्रों में बाँट दिया। इसके बाद Treaty of Sèvres (1920) में पहली बार कुर्दों के लिए संभावित स्वायत्तता का संकेत मिला।

लेकिन यह संभावना अल्पकालिक साबित हुई। Treaty of Lausanne (1923) ने आधुनिक तुर्की की सीमाएँ तय करते हुए कुर्द राज्य की अवधारणा को समाप्त कर दिया।

इसके परिणामस्वरूप कुर्द चार अलग-अलग देशों में विभाजित हो गए—और यही विभाजन आगे चलकर संघर्ष का मुख्य कारण बना।

विद्रोह और दमन का चक्र

कुर्दों के राजनीतिक संघर्ष का इतिहास विद्रोहों और दमन की एक लंबी श्रृंखला है।

तुर्की में 1920 और 1930 के दशक में कई विद्रोह हुए—जिनमें शेख सईद विद्रोह (1925), अरारत विद्रोह (1930) और डर्सिम विद्रोह (1937–38) शामिल हैं। इन सभी को तुर्की सरकार ने कठोर सैन्य कार्रवाई से दबा दिया।

ईरान में कुर्दों ने 1946 में एक ऐतिहासिक प्रयास किया। सोवियत समर्थन से पश्चिमी ईरान के शहर Mahabad में एक छोटे कुर्द राज्य की स्थापना की गई, जिसे महाबाद गणराज्य कहा गया।

इस राज्य का नेतृत्व Qazi Muhammad ने किया। लेकिन सोवियत संघ के समर्थन हटाते ही ईरानी सेना ने इस गणराज्य को समाप्त कर दिया और काजी मुहम्मद को फाँसी दे दी गई।

इराक में कुर्द आंदोलन का नेतृत्व प्रमुख नेता Mustafa Barzani ने किया। 1960 और 1970 के दशक में उन्होंने स्वायत्तता के लिए लंबा संघर्ष किया।

हालाँकि 1970 में बगदाद सरकार ने स्वायत्तता का वादा किया, लेकिन यह समझौता स्थायी नहीं रहा। 1975 के अल्जीर समझौते के बाद ईरान ने कुर्दों का समर्थन वापस ले लिया और आंदोलन कमजोर पड़ गया।

पीकेके और तुर्की का संघर्ष

1978 में Abdullah Ocalan ने Kurdistan Workers' Party (PKK) की स्थापना की।

यह संगठन मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित था और इसका उद्देश्य तुर्की के कुर्द क्षेत्रों में स्वतंत्र राज्य स्थापित करना था।

1984 में शुरू हुए सशस्त्र संघर्ष ने तुर्की की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। इस संघर्ष में लगभग 40,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई।

तुर्की, अमेरिका और यूरोपीय संघ PKK को आतंकवादी संगठन मानते हैं, जबकि कई कुर्द इसे स्वतंत्रता आंदोलन के रूप में देखते हैं।

अनफल अभियान: कुर्द इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी

1980 के दशक में इराकी राष्ट्रपति Saddam Hussein ने कुर्दों के खिलाफ अनफल अभियान चलाया।

इस अभियान का सबसे भयावह उदाहरण था Halabja Chemical Attack (1988)।

इस रासायनिक हमले में लगभग 5,000 लोग तत्काल मारे गए। व्यापक अनफल अभियान में कुल मिलाकर एक लाख से अधिक कुर्दों की हत्या और हजारों गाँवों का विनाश हुआ।

यह घटना अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार इतिहास में सबसे गंभीर अत्याचारों में गिनी जाती है।

इराकी कुर्दिस्तान का उदय

1991 के खाड़ी युद्ध के बाद अमेरिका ने उत्तरी इराक में नो-फ्लाई ज़ोन स्थापित किया। इससे कुर्दों को सुरक्षा मिली और उन्होंने राजनीतिक संस्थाएँ विकसित करना शुरू किया।

1992 में Kurdistan Regional Government (KRG) की स्थापना हुई।

आज KRG इराक के भीतर एक स्वायत्त प्रशासन के रूप में कार्य करता है और यह क्षेत्र अपेक्षाकृत स्थिर और आर्थिक रूप से सक्रिय माना जाता है।

2017 में यहां स्वतंत्रता जनमत संग्रह आयोजित किया गया जिसमें लगभग 92 प्रतिशत मतदाताओं ने स्वतंत्र राज्य का समर्थन किया। लेकिन इराकी सरकार और क्षेत्रीय शक्तियों के विरोध के कारण यह प्रयास सफल नहीं हो सका।

सीरिया का गृहयुद्ध और रोझावा

2011 में शुरू हुए सीरियाई गृहयुद्ध ने कुर्दों को एक नया अवसर प्रदान किया।

कुर्द बलों—विशेषकर YPG और YPJ—ने आतंकवादी संगठन ISIS के खिलाफ निर्णायक भूमिका निभाई।

उन्होंने उत्तरी सीरिया में “रोझावा” नामक स्वायत्त प्रशासन की स्थापना की, जो स्थानीय लोकतंत्र और लैंगिक समानता जैसे सिद्धांतों पर आधारित था।

हालाँकि तुर्की इस संरचना को PKK से जुड़ा मानता है और इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानता है।

ईरान में कुर्द आंदोलन

ईरान में कुर्द आबादी मुख्यतः पश्चिमी प्रांतों में रहती है।

यहाँ कई संगठनों ने समय-समय पर सक्रियता दिखाई है, जिनमें प्रमुख है

Free Life Party of Kurdistan (PJAK)।

यह संगठन PKK से वैचारिक रूप से जुड़ा माना जाता है और ईरान के खिलाफ सशस्त्र गतिविधियों में शामिल रहा है।

ट्रंप की नई कुर्द रणनीति

रिपोर्टों के अनुसार अमेरिकी प्रशासन ने ईरान और इराक के कुर्द नेताओं के साथ संपर्क स्थापित किया है।

संभावित रणनीति के तत्वों में शामिल हो सकते हैं:

  • अमेरिकी वायु समर्थन
  • खुफिया सहयोग
  • लॉजिस्टिक सहायता
  • ईरान के पश्चिमी क्षेत्रों में कुर्द विद्रोह को प्रोत्साहन

यह रणनीति प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप के बजाय प्रॉक्सी युद्ध का मॉडल हो सकती है।

अमेरिकी रणनीति के पीछे उद्देश्य

पहला उद्देश्य ईरान पर आंतरिक दबाव बढ़ाना हो सकता है। यदि कुर्द विद्रोह मजबूत होता है, तो ईरान को अपनी पश्चिमी सीमाओं पर अतिरिक्त सैन्य संसाधन लगाने पड़ सकते हैं।

दूसरा उद्देश्य क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करना है। अमेरिका लंबे समय से ईरान के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश करता रहा है।

तीसरा उद्देश्य यह भी हो सकता है कि अमेरिका प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए स्थानीय सहयोगियों के माध्यम से अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाए।

क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएँ

यदि यह नीति लागू होती है तो क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएँ तीव्र हो सकती हैं।

तुर्की किसी भी कुर्द आंदोलन को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानता है। इसलिए वह इसका विरोध कर सकता है।

इराकी कुर्द नेतृत्व भी सावधानी बरत सकता है क्योंकि उनके आर्थिक और राजनीतिक संबंध ईरान के साथ भी जुड़े हुए हैं।

इज़राइल इस रणनीति को ईरान पर दबाव बढ़ाने के एक अवसर के रूप में देख सकता है।

ऊर्जा और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

ईरान-इराक सीमा क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण है।

यदि इस क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है, तो इसका प्रभाव तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर पड़ सकता है।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य पहले ही वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा का संवेदनशील बिंदु है। किसी भी नए संघर्ष से वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता बढ़ सकती है।

कुर्दों के लिए अवसर और जोखिम

इस स्थिति में कुर्द आंदोलन के सामने अवसर और जोखिम दोनों मौजूद हैं।

अवसर यह है कि अंतरराष्ट्रीय समर्थन से उन्हें राजनीतिक मान्यता और स्वायत्तता के नए अवसर मिल सकते हैं।

लेकिन जोखिम यह है कि बाहरी शक्तियाँ उन्हें केवल रणनीतिक उपकरण के रूप में उपयोग कर सकती हैं।

इतिहास बताता है कि कई बार कुर्दों को अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला, लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दिया गया।

भविष्य की दिशा

कुर्द प्रश्न का समाधान केवल सैन्य संघर्ष से संभव नहीं है।

स्थायी समाधान के लिए आवश्यक है:

  • सांस्कृतिक और भाषाई अधिकारों की मान्यता
  • क्षेत्रीय स्वायत्तता
  • राजनीतिक संवाद
  • अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता

निष्कर्ष: संघर्ष से संवाद की ओर

कुर्द संघर्ष मध्य पूर्व की सबसे जटिल राजनीतिक समस्याओं में से एक है।

यदि अमेरिका की नई नीति वास्तविक रूप लेती है, तो यह क्षेत्रीय राजनीति को गहराई से प्रभावित कर सकती है। लेकिन इतिहास यह भी सिखाता है कि बाहरी हस्तक्षेप अक्सर अस्थायी समाधान प्रदान करते हैं और दीर्घकालिक स्थिरता नहीं ला पाते।

मध्य पूर्व की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्षेत्रीय शक्तियाँ और वैश्विक ताकतें इस मुद्दे को संघर्ष के बजाय संवाद और न्यायपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था के माध्यम से हल करने का प्रयास करें।

कुर्दों का संघर्ष केवल एक जातीय आंदोलन नहीं है—यह पहचान, अधिकार और राजनीतिक आत्मनिर्णय की उस सार्वभौमिक आकांक्षा का प्रतीक है जिसे आधुनिक विश्व व्यवस्था अभी तक पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाई है।

नोट-कुर्द संगठनों (PKK, PJAK, YPG, KRG) के नाम कुर्दीस भाषा में है लेकिन लेख में अंग्रेजी अनुवाद प्रयोग किया गया है


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